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Tuesday, June 2, 2020

एक मुट्ठी धूप !

एक बार फिर ज़िन्दगी की जंग लड़ते लोगों के लिए :

एक टुकड़ा धूप
हथेली में अपनी भर लूँ !

खोल दूँ ले जाकर
अँधेरों की कोठरी में
जहाँ से आती है 
घुटती सिसकती आवाज़ें-
अनजान आवाज़ें 
संघर्षशील
जीवन को पाने को !

नहीं कोई राह
बाहर निकलने की।

उम्मीद पर जी रहे हैं
कोई तो लाकर दे उन्हें
एक मुट्ठी धूप।

जी सकें वो भी,
एक पूरी ज़िन्दगी।

अम्बर हरियाणवी
JKSF/0004/2018
©KILOIA

Saturday, May 30, 2020

आहवान !

चाहने से कुछ बदल सकता है जग में,
उसके लिए तो अपना खून बहाना होगा।

दिलों में जला कर आशा की मशाल,
क्रांति का आह्वान सब में लाना होगा।

हर कोई हो उम्मीद में बदलेगा कोई,
किसी एक को तो सामने आना होगा।

कहना आसान है बहुत हर किसी के लिए,
कुछ कर के पहले ख़ुद को दिखाना होगा।

भाषणबाजी के समुंदर में बहुत है मगर,
विश्वास से इस दुनिया को जिताना होगा।

हर कोई है मगन, किसे परवाह किसी की,
'अम्बर' हर एक को झकझोड़ कर जगाना होगा।

अम्बर हरियाणवी
©KILOIA
17092019
JKSF 0004/2018

Friday, May 29, 2020

दिल्ली और कोरोना !

पुरे भारत के साथ दिल्ली में भी पहले २२ मार्च  को जनता कर्फ्यू के था ही लॉक डाउन शुरू हुआ. लॉक डाउन 1.0, लॉक डाउन 2.0 बहुत अच्छा रहा . लॉक डाउन ३.0 में लोगों को खुजली होने लगी. सरकार जनता के बारे में नहीं सोच रही है . काम नहीं होगा तो लोग भूखे मर जायेंगे . सभी लोग सरकार पर अपना गुम्बार निकालने लगे . इस दौरान कोरोना पुरे नियन्त्र्ण में था .

पर कुछ राजनीती, कुछ लोगों को काम की चिन्ता, सरकार ने लॉक डाउन ४.0 में बहुत छुट दे दी . १७ मई को लॉक डाउन ३.0 ख़तम हुआ, लॉक डाउन ४.0 शुरू हुआ. सरकार ने कुछ छुट दे दी , दुकानें खोलने की आज्ञा दे दी , लोगों को लगा की उन्हें आजादी मिल गयी है . सभी घरों  से बाहर निकल आये . लोगों को लगा की कोरोना उनका कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा. बहुत से लोग तो मास्क लगाना भी जरुरी नहीं समझ रहे है.ऐसे में कोरोना को मौका मिल गया . जहाँ पहले 100 – १५० केस हर दिन के आ रहे थे , धीरे धीरे बढ़ते बढ़ते कल (२८मई 20) ११०० केस एक दिन के हो गए . कुल मिलकर १६२८१ कैसें २९ तारीख तक को दर्ज हुए . २७, २८ और २९ मई को संख्या 1000 प्रतिदिन  के आसपास हो गयी . ११ दिन में क़रीब ६५०० नए केस आ गए .

अचानक से इतने केस बढ़ने का कारण लोगों की भीड़ बढ़ने से हुआ . सभी पैसा कमाना चाह रहे है . लेकिन लॉक डाउन ४.0 में सब को समझ आ गया की पैसे से ज्यादा जान बचाना जरुरी है . पहले सरकार ने दो महीने सभी को अच्छी तरह से समझा दिया की घर में रहने में ही भलाई है , परन्तु जनता को समझ नहीं आ रहा था . उन्हें लग रहा था की सरकार उन्हें बेवकूफ़ बना रही है . हम घर पर रहेंगे तो काम कैसे चलेगा ?

इसलिए लॉक डाउन ४.0 में सरकार ने जनता को पूरी छुट दे दी . सुबह ७ बजे से शाम ७ बजे घुमो फिरो , कोई रोकटोक नहीं . लोग ने भी मनमर्जी शुरू कर दी . नतीज़ा ११ दिन में ६५०० नए केस . पहले प्रतिदिन २०० – २५० केस ही आते थे , अब प्रतिदिन का आकड़ा ११०० को पार कर गया .

शायद लोगो को समझ आने लगा है की कहीं कुछ ग़लत होने जा रहा है . दुकानदारों को लग रहा था की सरकार जबरदस्ती उनकी दुकानें बंद करवा रही है, लेकिन अब उन्हें समझ आ गया है की सरकार सही थी, अपने घर में रहने में ही भलाई है . अब सब अपनी मर्जी से दुकान बंद कर रहे है .

शायद अब लोगो को समझ में आ जाये की अपनी सुरक्षा कितनी जरुरी है . भारत में लोगों को सब चीजों का मजाक बनाने की आदत सी हो गयी है . उन्हें लगता है की कोरोना उनका कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा . परन्तु अब ऐसी नौबत आ गयी है की कोरोना का कोई भी चिन्ह नज़र नहीं आता और इंसान कुछ ही घंटो में चल बसता है .

सरकार के पास भी इतने साधन नहीं है की सब को हॉस्पिटल में भर्ती रख सके . अभी कोरोना का कोई भी इलाज़ नहीं है . दो दिन पहले के समाचार ने शायद सब को जरुर हिला दिया होगा . किसी हॉस्पिटल में १८० से ज्यादा लाशें अपने अंतिम संस्कार की प्रतीक्षा में है . श्मशान घाट पर पूरी सुविधाएँ नहीं है . मृतक का शरीर भी परिवार वालो को नहीं दिया जा रहा है . लोगों को स्तिथि शायद समझ में आ जाये . अपनी सुरक्षा सब से जरुरी है . २०२० निकल जाये . जान बची रहेगी तो २०२१ में सब करना जो इच्छा हो .

घर पर रहे, सुरक्षित रहे !

अम्बर हरियाणवी

#KILOIA


Sunday, May 12, 2019

सखी साहित्य परिवार दिल्ली इकाई की सातवीं काव्य गोष्ठी - १२ मई २०१९

सखी साहित्य परिवार की सातवीं काव्य गोष्ठी दिनांक 12 मई 2019 को सखी साहित्य परिवार की दिल्ली सचिव श्रीमती आशा दिनकर जी के निवास स्थान पर हुयी। दिल्ली अध्यक्ष मुकेश गोयल 'किलोईया' के साथ दिल्ली उपाध्यक्ष कर्मेश सिन्हा जी भी उपस्थित रहे।

उपस्थित साहित्यकार।

1. सुभाष दुआ जी - जिंदगी कुछ यूं कटी गुनहगार हूँ जैसे
2. अशोक सिंह सत्यवीर - माँ
मातर दिवस की शुभ बेला में मात्र शक्ति को करे नमन।
3. सपना सक्सेना - दौरे उल्फत गुजर गया होता। वो भी तुझ सा जो गिर गया होता।
4. मालती मिश्रा जी - जिसके जो मन मे हो कह कर प्रगट करे, अभिव्यखती का सब को अधिकार चाहिए।
5. आफताब आलम - वो अपने खून को जब सरहदों पे बोता है, तब कहीं चैन से ये अपना देश सोता है।
- ये नफ़रत की आंधी ये दंगो के तूफ़ान
मेरा देश जाने कहाँ जा रहा है।
6. अंजना अंजुम - निगाहों में छुपा कर एक चाहत लेकर आई हूं। तबसुम में सजी लिपटी एक इबादत लेकर आई हूं
7. चित्रा चतुर्वेदी - नफरतों से भरी है ये दुनिया मेरे यारो,
- प्यार के रंगों में यूँ रंग जाओ, मजहबो को यूँ लेके न झगड़ो करो।
8. कर्मेश सिन्हा - नेताओ की ये नई चाल है, ये चुनावी साल है, ये चुनावी साल है
9. अजो देवी - तुम्ही मेरी कहानी हो, तुम्ही अल्फाज हो मेरे, हो मेरी जिंदगानी तुम।
10. विजय लक्ष्मी - तुमने मुझे गढ़ा, तुम्हे कैसे गड़ू माँ
11. मंजू शाक्य - मैं दिल मे प्यार छोटो का बड़ो का सम्मान करती हूँ
12. इब्राहिम अल्वी - मेरे मन की पीर को जान सका है कौन, माँ की जब चर्चा चले, मैं रहता हूँ मौन
13. प्रवीण त्रिपाठी - भारत के हर भाग में गर्मी पड़े प्रचंड,
14. अनुराग - दिल से दिल तक कोई तो सदा जाएगी, उसके दर तक जो वादे शफा जाएगी

इसके बादमुझेकिसीकारण वश जाना पड़ा ..बाकि के साहित्यकारों काकाव्यपाठ में श्रवण नहीं कर पाया ..

अंबर हरियाणवी













माँ

माँ
कब से
नहीं सुनी,
तुम्हारी लोरी,
काश!
एक बार फ़िर से,
तुम आ जाती वापिस।
इस बेचैन जिंदगी में,
कुछ मिलती राहत।
तुम्हारे आँचल की छांव में,
मैं बन जाता एक छोटा बच्चा।

अम्बर हरियाणवी
©KILOIA

Friday, April 19, 2019

जलती चिता !

जलती चिता-
पूछ रही है एक सवाल
क्यों इंसान लगा है
सब को काटने में
क्या पाता है वो ?

बस जल जाना है अंत में
बचती हैं कुछ हड्डियाँ
कुछ राख
जल जाता है सब कुछ
कुछेक पल में !

अपने ही देते हैं जला
छोड़ आते है उस धधकती आग में
कितने पत्थर दिल होकर !

प्राण निकलते ही शरीर से
हो जाता है इंसान एक शव
जीते जी जिसे पूछते हैं सभी
शव होते ही हो जाता है भारी

निकालो इसे जल्दी निकालो
घर से इसे बाहर निकालो
रखते ही अर्थी पर
उठाओ उठाओ की आवाजें
जल्दी करो की आवाजें

क्यों इतना बेसब्र हो जाता है इंसान
अपने ही को
निकालने को आतुर
घर से बाहर
जलाने को आग में

क्या है ये जिंदगी ?

भूल जाते हैं सभी
मरघट से बाहर आते ही
कि आना है तुम्हें भी यहाँ
अपने आख़िरी दिन

फिर क्यों लगा है ?
बुरा कमाने में
जब होना ही है राख
क्या साथ लेकर जा सकेगा
ये धनदौलत ये घर-बार
ये बीबी-बच्चें, ये संसार
आया खाली हाथ
और जाएगा खाली हाथ

ये जलती चिता
जिसे सब भूल जाते हैं
आँखों से ओझल होते ही

अम्बर हरियाणवी
Copyright : KILOIA
 सिर्फ़ बाकी निशां रह जायेगा !

वो कहते हैं-
मुझे हर व्यक्ति इंसान नज़र आता है।
न कोई हिन्दू न मुसलमान नज़र आता है।

फिर ये इंसान!
कैसे बन जाते हैं शैतान?
उतर आते हैं कत्लो-गारत पर,
बहा देते है मानवों का खून
तब कहाँ मर जाती है
इन इंसानों की इंसानियत !

तब ये इंसान
क्यों बन जाते हैं हिन्दू-औ- मुसलमान ?

बन जाते है मौत के सौदागर।
बँट जाते हैं मज़हबों में
क्या नहीं रह सकते मिलकर आपस में ?

शांति दूत जो बातें करते हैं
आतंक से धरती को जय करने की
ख़ुद ही मिट जायेंगे
अपनी ही बनायी नफ़रत की दुनिया में
बह जायेंगे वो वक्त के साथ
खून की उन्हीं नदियों में
जो बना दी हैं इन्होंने
दूसरों का खून बहाकर

कौन अमर रहा है इस धरा पर
ये तो गीता का ज्ञान है अमर बस
जो आया है वो जायेगा
सिर्फ़ बाकी निशां रह जायेगा।

अम्बर हरियाणवी
Copyright : KILOIA