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Monday, February 4, 2019
ज़िंदगी और धर्म
ज़िंदगी की जद्दोजहद में
लगे है सभी
चाहे हों हिन्दू
चाहे हों मुसलमान
चाहे हों सिक्ख
चाहे ईसाई
किसे फ़ुरसत है
बात करे धर्म की
पेट धर्म के आगे
सभी धर्म फ़ीके हैं
पेट मांगता है खाना
वो नहीं जानता कोई धर्म
पेट को भरने का
करते सभी कर्म
वो बूढ़ी अम्मा
बेचती है सब्जियां
नाम के लिये
वो तो बाँटती है
खूब सारा प्यार
सभी में
न उसे धर्म से लेना
न उसे जाति से कुछ लेना
जो भी आता है
सब्जी के साथ पाता है
अम्मा का प्यार
वो बूढ़े अब्दुल मियां
अपनी ही तरह
बूढ़ी हो चुकी साइकिल पर
बेचने निकलते हैं
अपना पेट भरने की खातिर
भरते हैं दूसरों का पेट
बेचते हैं नमकीन और ब्रेड
कोई नहीं पूछता
तुम किस धर्म के हो
तुम किस जात के हो
छोटे बड़े, बच्चे बूढ़े
सभी ख़रीदते हैं उनसे
वो पीपल के पेड़ के नीचे
बूढ़ा हो चला मोची
पीपल के पेड़ की तरह
बढ़ती उम्र उसकी
अब भी सुबह से शाम तक
पूरे दिन करता है मेहनत
कमाता है कुछ पैसे
भरने को पेट
अपना और परिवार का
जूते ठीक करवाते
किसी ने नहीं पूछा
उसकी जाति और धर्म
तुम हिन्दू हो
या तुम मुसलमान हो
लगते तो तुम
सब जैसे इंसान हो
सब की अपनी अपनी मज़बूरी है
धर्म से पहले, पेट की आग बुझानी ज़रूरी है।
पेट न कोई जाति न ही कोई धर्म जानता है
वो तो रोटी को ही तो बस मानता है
पेट हो भरा तो खुराफ़ात सूझती है
जाति और धर्म को पूछती है।
ओ दुनियां के शैतानों
तुम भी जागो और जानो
सब से पहले इंसान है
उस के बाद धर्म और ईमान है।
अम्बर हरियाणवी
सर्वाधिकार सुरक्षित
@kiloia
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1 comment:
A poem is very sweet, real humanity is seen, it is the mirror of our society.
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