ये बदलता मौसम
असर है प्रदूषण का
वो कंपकंपाती ठंड
वो गहरा कुहासा
सब खो रहा है
धीरे धीरे।
पहनते थे हम सब
मोटे मोटे वस्त्र
फिर भी हमें
लगती थी ठंड
वो हाथों को चीरती
ठंडी हवाएं
वो कानों को सहलाती
गालों को करती लाल
हो जाते थे सेब से
दोनों गाल
वो ठंडे हाथों से
छूना किसी को
वो रजाई खींच कर
जगाना किसी को
वो तालाब के पानी में
ऊँगली डूबोना
झटके से उसे फिर
बाहर निकालना
सी-सी कर-कर के
ज़ोर से घुमाना
सब बदल गया है अब तो ।
मौसम भी गिरगिट हो गया है
वो बदलता रहता है हर पल।
इंसानी स्वभाव भी कुछ कुछ
हो रहा है मौसम सा
कभी सर्द कभी गर्म।
उस पर न जाने
असर है कौन से प्रदूषण का
क्यों हो रहा है गर्म तवे सा?
जलता रहता है क्रोध की आग में
जैसे रखा हो नाक की नोक पर
न वो सहनशक्ति है न है शीतलता
मौसम के साथ खो गयी है
इंसान की इंसानियत
वो भाईचारा
वो आपसी शिष्टाचार
कैसे होगा दूर
ये प्रदूषण
कैसे फिर से आएगी वो ठंड?
कैसे होगा इंसानी मन शीतल।
अम्बर हरियाणवी
@KILOIA
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