न ढलता दिन अगर
न होता कभी अंधेरा
न उगता अगर सूरज
न होता कभी सवेरा
जीवन की आपा - धापी में
खो गया हूँ बीच दिनों के
आज है जाता कल है आता
नहीं होता कहीं बसेरा
न उगता अगर सूरज
न होता कभी सवेरा
यौवन बीता आया बुढ़ापा
रुत जीवन की चली गयी
कल को रोता आज को खोता
बस करता तेरा - मेरा
न उगता अगर सूरज
न होता कभी सवेरा
जागो ! खोलो आँखें अब तो
भोर जीवन की देती दस्तक
क्यों अब भी तू है सोता
अंधकार का हट गया पहरा
न उगता अगर सूरज
न होता कभी सवेरा।
अम्बर हरियाणवी
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