उजाला
अंधेरो से मुझे लगाव है बहुत
सूरज के उजालो से डर लगता है
जब भी चाह उसे मैंने हम ना मिल सके ,
उनके ख्यालो से मुझे डर लगता है,
मै चाहता हूँ ख़ुशी के गीत लिखना,
मगर गम के नजरानो से डर लगता है ,
हाथ में हो हाथ वो साथ हो मेरे ,
फिर भी उनके छूट जाने का डर लगता है ,
उजाला उनकी यादों का किसी सूरज से कम नहीं ,
पर मुझे उस सूरज के डूब जाने का डर लगता है ,
अब और नहीं मुझ में कुब्बत यारो ,
बहार मिली नहीं और खिजाओ के आने का डर लगता है ,
मुकेश गोयल ‘किलोईया’
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