धर्म तो होता है शांतिदूतों का भी,
जो करते है नफ़रत दूसरे धर्म से !
रक्षक के रूप में
आए थे वो भक्षक,
नफ़रत थी तो सिर्फ़ हिंदुओं से,
न कोई जाति,न कोई भाषा,
न कोई जिला, न कोई प्रांत,
सिर्फ़ और सिर्फ़ हिन्दू ,
जो बंटे है, आपस में,
धर्मनिरपेक्षता के नाम पर,
क्या ठेका सिर्फ़ हिंदुस्तान का ही है?
धर्म निरपेक्ष होने का?
कब तक हम बंटेगे,
जाति और भाषा के नाम पर?
जब तक हम बटेंगे, तब तक हम कटेंगे,
कब होंगे हम सिर्फ़ और सिर्फ़ हिन्दू?
कब दूर होंगी हमारी जातियां?
कब होगा दुनियां में,
एक हमारा हिन्दू राष्ट्र?
भगवा या हिन्दू,
अपने ही देश में,
नहीं अब सुरक्षित,
नहीं मानते है अब भी हम,
नहीं जागते है अब भी हम,
उठाओ हथियार, उठाओ हथियार,
लड़नी होगी एक और जंग,
लड़नी होगी अपने अस्तित्व की लड़ाई,
अपने ही देश में,
नहीं है हिंदुओं का होते हुए भी,
हिंदुओं का ये देश,
न्यायालय भी मांगता है सबूत,
धर्मनिरपेक्षता का अंधा समर्थन,
क्या बिक गया है यहां सब?
उम्मीद करे भी तो किस से?
सब कुछ तो बिक चूका है,
हिन्दू बिक चुका है स्वयं,
करता है विरोध,
अपने ही हिंदुत्व का,
लड़ता है न्याय की लड़ाई,
अपने ही दुश्मन के लिए!
क्या सुरक्षित हो तुम?
जब पूछा जाता है, तुम से तुम्हारा धर्म,
उतार दिया जाता है,माथे में गर्म लोहा,
रोते बिलखते बच्चें और औरतें,
हर तरफ़ लाशें ही लाशें,
अट्टहास करता दानव,
जिसका कोई धर्म नहीं,
क्योंकि वो तो शांतिदूत है,
मिटाता है दूसरों की शांति,
बहाता है दूसरों का रक्त,
करता है दूसरों की बहन, बेटियों को विधवा,
और हमारे धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदार,
जो कहते है खुलेआम,
शांतिदूतों का तो कोई धर्म ही नहीं होता!
और वो शांति दूत,
मारते है धर्म पूछ पूछ कर,
हिन्दू धर्म के ही मानव को,
करते है नंगा, मानवता को,
जांच के लिए उतरवा लेते है,
इंसान के कपड़े भी,
मगर इन सब के बीच,
सवाल वही आ जाता है एक?
कोई तो होगा इन शांतिदूतों का मददगार,
वरना नहीं दे पाते अंजाम,
इतनी बड़ा नरसंहार,
जांच हो पूरी, हो फ़िर से एक,
सर्जिकल स्ट्राइक,
दुश्मन को नेस्तनाबूद करने को,
दुश्मन को ख़ाक में मिलाने को,
होना होगा हम सब को एक,
भूलनी होगी अपनी जाति, अपनी भाषा,
देना होगा जवाब,
हमें जाति और भाषा में बांटने वालो को!
बनो सिर्फ़ - एक हिन्दू तुम,
राष्ट्र को भी हिंदुस्तान बनाना होगा,
एक बार फिर से होगा समर,
अपने अंदर के हिन्दू को जगाना होगा।
अम्बर हरियाणवी
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